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ईसा -अलैहिस्सलाम- ने अपने शत्रुओं से लड़ाई नहीं की, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने क्यों की?

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पैगंबर मूसा एक योद्ध थे और दाऊद भी एक योद्धा थे। मूसा और मुहम्मद ने, उन दोनों पर अल्लाह की शांति हो, राजनीतिक और सांसारिक मामलों की बागडोर संभाली और दोनों ने बुतपरस्त समुदाय से हिजरत की। मूसा -अलैहिस्सलाम- अपने समुदाय के साथ मिस्र से निकल गए और मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने यस़रिब (मदीना) की ओर प्रवास किया। इससे पहले भी आपके अनुयायियों ने हब्शा की ओर हिजरत की थी। ऐसा उन देशों के राजनीतिक और सैन्य प्रभाव से बचने के लिए किया गया था, जहां से वे अपने धर्म के साथ निकल गए थे। इसमें और मसीह -अलैहिस्सलाम- के आह्वान के बीच का अंतर यह था कि मसीह -अलैहिस्सलाम- का आह्वान गैर-बुतपरस्त लोगों के लिए था। अर्थात् यहूदियों के लिए। जबकि मूसा एवं मुहम्मद जिस माहौल (मिस्र तथा अरब) में काम कर रहे थे, वह बुतपरस्तों का था। इन दोनों जगहों की परिस्थितियाँ कहीं ज़्यादा मुश्किल थीं। मूसा एवं मुहम्मद -उन दोनों पर अल्लाह की शांति हो- के आह्वान से जिस बदलाव की आशा की जाती थी, वह एक आमूलचूल और व्यापक परिवर्तन था। बुतपरस्ती से एकेश्वरवाद की ओर एक विशाल परिवर्तन।

रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के समय होने वाले युद्धों में मरने वालों की संख्या हज़ार से अधिक नहीं थी। वह भी अपने आपकी रक्षा करते हुए, आक्रामकता की प्रतिक्रिया में या धर्म की रक्षा में यह जानें गईं। जबकि दूसरे धर्मों में धर्म के नाम पर छेड़ी गई जंगों में मरने वालों की संख्या को देखते हैं, तो वह लाखों तक पहुँचती है।

इसी प्रकार मक्का विजय के दिन मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की दया स्पष्ट रूप से सामने आई, जब आपने कहा : आज रहम करने का दिना है। आपने क़ुरैश की व्यापक माफ़ी का ऐलान किया, जिस क़ुरैश ने मुसलमानों को कष्ट पहुँचाने में कोई कमी नहीं की थी। इस बुराई का बदला भलाई एवं बुरे व्यवहार का प्रतिफल अच्छा व्यवहार से दिया।

''भलाई और बुराई बराबर नहीं हो सकते। आप बुराई को ऐसे तरीक़े से दूर करें जो सर्वोत्तम हो। तो सहसा वह व्यक्ति जिसके और आपके बीच बैर है, ऐसा हो जाएगा मानो वह हार्दिक मित्र है।'' [157] [सूरा फ़ुस्सिलत : 34]

धर्मपरायण लोगों के कुछ गुण हैं। अल्लाह तआला ने कहा है :

''(धर्मपरायण लोग वे हैं) जो क्रोध को दबा लेते हैं, लोगों को क्षमा कर देते हैं और अल्लाह भलाई करने वालों को पसंद करता है।'' [158] [सूरा आल-ए-इमरान : 134]

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